न मंडी चाहिए न एमएसपी, ये किसान सहकारिता से संवार रहे अपनी किस्मत

power of cooperation no mandi no msp
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दिल्ली: एक कुशल नेतृत्व के साथ 131 गांवों के 10,500 किसान साथ मिलकर अपने खेत से निकले फल और सब्जियां नासिक, पुणे और मुंबई सहित 42 देशों तक पहुंचाकर अपनी किस्मत सुनहरे अक्षरों से लिख रहे हैं। इन्हें किसी सरकार के सामने हाथ फैलाने की जरूरत महसूस नहीं होती।

संगठन से संवरी किस्मत-

विलास शिंदे नासिक के एक छोटे से गांव के एक छोटे किसान थे। साल 2000 में सिर्फ दो एकड़ अंगूर की खेती थी। बाजार और मंडी (एपीएमसी) के धक्के खाते-खाते उन्हें समझ में आया कि यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती। तब उन्होंने अपने पास-पड़ोस से किसानों से चर्चा कर उन्हें अपने साथ जोड़ा और काम करने का तौर-तरीका बदलने लगा।

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दस साल पहले बनाई थी कंपनी-

करीब 10 साल पहले सह्याद्रि फार्म प्रोड्यूसर कंपनी की स्थापना कर बड़ी संख्या में किसानों को संगठित किया और अंगूर की खेती शुरू की। सहकारिता के आधार पर चलने वाली उनकी कंपनी से अब तक 131 गांवों के 10,500 किसान जुड़ चुके हैं। इनमें 1250 किसान करीब 6000 एकड़ में सिर्फ अंगूर की खेती करते हैं। सह्याद्रि फार्म प्रोड्यूसर कंपनी इन किसानों को न सिर्फ अंगूर के उन्नत किस्म के पौधे उपलब्ध कराती है, बल्कि फसल की देखरेख में भी सहायता करती है। गुणवत्ता का विशेष ख्याल रखा जाता है।

सिर्फ 15-17 फीसद की हिस्सेदारी-

अंगूर टूटने के बाद उनकी पैकेजिंग ठीक से करवाई जाती है एवं यूरोप, रूस और खाड़ी के देशों समेत 42 देशों में उनका निर्यात करती है। देश से अंगूर के निर्यात में 15-17 फीसद हिस्सा सह्याद्रि का होता है। पिछले साल 22000 टन अंगूर निर्यात किया गया।

फलों एवं सब्जियों के उत्पादक किसान भी जुड़े-

पिछले कुछ वर्षो में अंगूर के अलावा अन्य फलों एवं सब्जियों के उत्पादक किसान भी सह्याद्रि से जुड़ गए हैं। ये किसान तमाम तरह की ताजी सब्जियां एवं नासिक की आबोहवा में होने वाले अन्य फलों का उत्पादन करते हैं।

फल-सब्जियां विदेशों को भेजी जाती हैं-

नासिक में 95 एकड़ में फलों-सब्जियों की छंटाई-पैकेजिंग-प्रोसेसिंग के लिए केंद्रीयकृत व्यवस्था बनाई गई है। शीतगृह बनाए गए हैं। यहीं से पैक किए गए फल-सब्जियां विदेशों को भेजी जाती हैं और विदेशों से आए उन्नत किस्म के बीज व कलमें किसानों को वितरित की जाती हैं।

लॉकडाउन में भी जारी रही बिक्री-

कोरोना के दौरान जब सब्जियों-फलों की दुकानें बंद थीं, आवागमन ठप हो गया था तब सह्याद्रि ने ई-कामर्स एवं नासिक, पुणे, मुंबई में स्थित अपने 12 आउटलेट के जरिये फलों-सब्जियों की बिक्री जारी रखी। अकेले मुंबई की 850 हाउसिंग सोसायटी में सह्याद्रि की ताजा सब्जयां और फल लगातार पहुंचते रहे।

मंडी तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती-

विलास शिंदे बताते हैं कि सहकारिता के आधार पर चलने वाली इस पूरी प्रक्रिया में 24 से 30 घंटे के अंदर ताजे उत्पाद खेतों से निकलकर ग्राहकों तक पहुंच जाते हैं। कई बार ग्राहकों को दाम भी कम देना पड़ता है। किसानों को किसी मंडी तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती। उत्पाद की बर्बादी कम होती है। इसका पूरा लाभ कंपनी को होता है, जो किसानों को उनके द्वारा दिए गए उत्पाद के अनुपात में बांट दिया जाता है।

10 हजार से ज्यादा किसानों का नेतृत्व कर रहे विलास शिंदे-

सह्याद्रि फार्म प्रोड्यूसर कंपनी के प्रबंध निदेशक के रूप में अब 10 हजार से ज्यादा किसानों का नेतृत्व कर रहे विलास शिंदे के अनुसार, उन्होंने शुरू में ही सोच लिया था कि हमें सरकार की मदद मिले न मिले, अपने दम पर आगे बढ़ना है। उनके अनुसार फलों-सब्जियों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का प्रावधान वैसे भी नहीं है। गुजरात की अमूल पद्धति से सहकारिता के आधार पर उत्पादन और विपणन का तौर-तरीका अपनाने से मंडी की भी जरूरत खत्म हो गई।

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