मकर संक्रांति का ऐसा क्या महत्व है कि यह संपूर्ण भारत का प्रमुख त्यौहार है: पण्डित पुरूषोतम सती

मकर संक्रांति
मकर संक्रांति

पण्डित पुरूषोतम सती: मकर संक्रांति का महत्व सनातन संस्कृति में हमेशा से रहा है और आज भी सभी लोग इस दिन का इंतज़ार करते हैं। इंतज़ार करने का कारण सबका अलग-अलग हो सकता है परंतु महत्व अवश्य है इस पर्व का।

मकर संक्रांति का शाब्दिक अर्थ-

मकर संक्रांति दो शब्दो से मिलकर बना है जिसमें मकर वैदिक ज्योतिष की एक राशि है और सक्रांति का तात्पर्य हुआ संक्रमण। मकर राशि में भगवान सूर्य का संक्रमण या प्रवेश मकर संक्रांति की घटना होती है जो कि विशुद्ध खगोलीय घटना है। वैदिक ज्योतिष में सुर्य के उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश का दिन भी माना जाता है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण-

सूर्य भगवान जब खगोलीय पथ पर चलते हुए मकर राशि के नक्षत्र में प्रवेश करते हैं तो मकर संक्रांति का प्रारंभ या पुण्य काल प्रारंभ होता है और भारतवर्ष में यह वसंत ऋतु के प्रारंभ का भी समय होता है।

मकर संक्रांति
मकर संक्रांति

मकर संक्रांति 2020 का ज्योतिषीय विश्लेषण-

भगवान सूर्य 14 जनवरी की सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर धनु राशि की यात्रा समाप्त करके मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं, जहां ये पहले से विराजमान बुध, गुरु और शनि के साथ युति करेंगे। इस प्रकार चतुर्ग्रही योग का निर्माण होगा।
पुण्य काल: मकर संक्रांति का पुण्य काल 15 जनवरी सुबह तक रहेगा।

सूर्य पूर्व दिशा से उदित होकर 6 महीने दक्षिण दिशा की ओर से तथा 6 महीने उत्तर दिशा की ओर से होकर पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं। उत्तरायण का समय देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन का समय देवताओं की रात्रि होती है, वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा गया है।

मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व-

मकर संक्रांति की महत्ता को लेकर पुराणों में अनेक प्रसंग आते हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

  1. भगवान आशुतोष ने इस दिन भगवान विष्णु जी को आत्मज्ञान का दान दिया था।
  2. देवताओं के दिनों की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है। सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है तो उस अवधि को देवताओं की रात्री व उतरायण के छ: माह को दिन कहा जाता है।
  3. भारत के युद्ध में जब भीष्म पितामह को मृत्यु शैया पर लेटना पड़ा था, तब अपनी इच्छा मृत्यु के लिए उन्होंने इसी उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी, इसलिए उत्तरायण पर्व को भीष्म पर्व भी कहते हैं। मकर संक्रांति के दिन भीष्म पितामह ने शरीर का त्याग किया था।
  4. कहा जाता है कि आज ही के दिन गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी। इसीलिए आज के दिन गंगा स्नान व तीर्थ स्थलों पर स्नान दान का विशेष महत्व माना गया है।
  5. इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है।

मकर संक्रान्ति का भौगोलिक कारण-

भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है।

मकर संक्रांति
मकर संक्रांति

मकर संक्रांति में दान का महत्व-

धर्म शास्त्रों के अनुसार कोई भी धर्म कार्य तभी फल देता है, जब वह पूर्ण आस्था व विश्वास के साथ किया जाता है। जितना सहजता से दान कर सकते हैं, उतना दान अवश्य करना चाहिए।

इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है-
माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

भावार्थ-

मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। इसी दिन से कुंभ मेला भी शुरू होता है और पहला शाही स्नान इसी दिन होता है। इस साल हरिद्वार कुंभ भी मकर संक्रांति से शुरू हो रहा है।

मकर संक्रांति एक क्षेत्र विशेष का त्यौहार नहीं अपितु भारतवर्ष का त्यौहार है-

मकर संक्रांति भारत के लगभग सभी राज्यों में और नेपाल में मनाया जाता है। उत्तर भारत में यह पर्व ‘मकर सक्रान्ति के नाम से और गुजरात में ‘उत्तरायण’ नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति को पंजाब में लोहडी पर्व, उतराखंड में उतरायणी, गुजरात में उत्तरायण, केरल में पोंगल, गढवाल में खिचडी संक्रान्ति के नाम से मनाया जाता है।

“गोस्वामी तुलसीदास जी ने बहुत सुंदर लिखा है
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥”

भावार्थ-

माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं तब सब लोग तीर्थराज प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं।

उत्तराखंड में विशेष-

उत्तराखंड में इस पर्व को घुघती सक्रांति या खिचड़ी सक्रांति कहते हैं। इस दिन प्रातःकाल में सर्वप्रथम कौवों को हलवा खिलाया जाता है और माना जाता है कि ये हमारी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। इसके बाद भगवान को भोग लगाने के बाद सभी घुघुति का आंनद लेते हैं। घुघुति अलग अलग आकार की बनाई जाती है जैसे तलवार, डमरू या कुछ भी। फिर ससुराल में बेटियों को और रिश्तेदारों को घुघुति दिया जाता है।

पण्डित पुरूषोतम सती
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